Shri Krishna

Why do I restless
Why do I restless
1 min
Hindi article on restlessness by AP
आपके मूड को कौन नियंत्रित करता है?
आपके मूड को कौन नियंत्रित करता है?
3 min
हमारा मिजाज हमेशा दूसरों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। नतीजे आपकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे। इसलिए अब आपको मनोबल बढ़ाने वाले किसी प्रेरक वक्ता की ज़रूरत है। जैसे ही वह व्यक्ति चला जाता है, आपकी ऊर्जा भी थम जाती है। लेकिन जीने का एक और तरीका भी है। अपने भीतर गहराई में, मुझे एक ऐसा बिंदु मिलता है जिसे कोई बाहरी परिस्थिति छू नहीं सकती। जो कुछ भी होता है, वह सतह पर ही घटित होता है। वह स्थिर, उदासीन और तटस्थ बना रहता है। तब आप सचमुच स्वतंत्र होते हैं।
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1 min

Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?

Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We

Why do I restless
Why do I restless
9 min
This article is related to restlessness.
राधा-कृष्ण में भी तो प्रेम था, तो आप हमारे प्रेम को सम्मान क्यों नहीं देते?
राधा-कृष्ण में भी तो प्रेम था, तो आप हमारे प्रेम को सम्मान क्यों नहीं देते?
10 min
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
What is Dharma? - Bhagavad Gita
What is Dharma? - Bhagavad Gita
11 min

Overview

Fighting Duryodhana is Dharma. Fight Duryodhana in the way you can, that is swadharma. Dharma is the same for everybody, but swadharma varies according to your physical, social, temporal conditions. But remember that swadharma can never be in contradiction of Dharma; swadharma will always be something

(Gita-3) Don't go too far, you may never return || Acharya Prashant, on Bhagavad Gita (2023)
(Gita-3) Don't go too far, you may never return || Acharya Prashant, on Bhagavad Gita (2023)
63 min

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ।।1.42।।

saṅkaro narakāyaiva kula-ghnānāṁ kulasya cha patanti pitaro hy eṣhāṁ lupta-piṇḍodaka-kriyāḥ

When the castes mix, that spells hell for the family. It destroys the family, in the way that the ancestors all fall because they are deprived of the Pindokdakriya.

Quotes on Destiny - Bhagavad Gita
Quotes on Destiny - Bhagavad Gita
12 min

Overview

We want to reach the end of wanting. We want completion, fulfillment in such a final way that we are left with nothing to want anymore. That’s the destination. Born a human being, you will have to act. Act rightly. Act for the right purpose. Live for the right

शरीर के लिए योग, मन के लिए वेदांत || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
शरीर के लिए योग, मन के लिए वेदांत || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
4 min

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या

समय और संसार क्यों? मर्यादा अनिवार्य क्यों? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
समय और संसार क्यों? मर्यादा अनिवार्य क्यों? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
8 min

प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।

प्रारब्ध, कर्मफल और आत्मविचार || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
प्रारब्ध, कर्मफल और आत्मविचार || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
14 min

प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी

एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
19 min

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥

"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०

आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के

हमारे जीवन के युद्ध और कृष्ण की समीपता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
हमारे जीवन के युद्ध और कृष्ण की समीपता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
15 min

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क

हम सब के भीतर एक अर्जुन है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
हम सब के भीतर एक अर्जुन है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
5 min

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत

कर्म और कर्म में भेद || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
कर्म और कर्म में भेद || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
8 min

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, प्रथम अध्याय, अर्जुन विषाद योग। देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए अर्जुन कहते हैं:

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: |

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥

यद्यपि ये

हमारे जीवन में कब उतरती है गीता? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
हमारे जीवन में कब उतरती है गीता? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
13 min

प्रश्नकर्ता: आपकी जो बाकी शिक्षाएँ हैं वो भी मुझे बिलकुल गीता से मिलती हुई लग रही हैं। आप जैसे पहले कहते थे कि हृदय में शिव और भुजाओं में शक्ति। तो अभी आप बोले कि हृदय कोमल होना चाहिए और बलिष्ठ भुजाएँ होनी चाहिए तो बिलकुल वो बातें एक जैसी

कौन है गीता का अधिकारी?  || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
कौन है गीता का अधिकारी? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
20 min

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्। कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥27॥

अर्जुन उवाच।

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥28॥

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥29॥

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥

“जब कुन्तिपुत्र अर्जुन ने अपने बंधु बान्धवों को वहाँ

कब घटित होती है गीता?  || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
कब घटित होती है गीता? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
12 min

यावदेतानिरीक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान्।

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥22॥

“मैं इन सब युद्ध करने की कामनाओं से अवस्थित योद्धाओं को देखूँ कि किन वीरों के साथ मुझे युद्ध करना होगा।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २२, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य प्रशांत: क्या जानते नहीं हैं अर्जुन कि किनके साथ युद्ध करना होगा?

अर्जुन की पात्रता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
अर्जुन की पात्रता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
21 min

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥21॥

“हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य मेरा रथ स्थापित करें।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २१, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य प्रशांत: अर्जुन का ये अनुरोध मेरे मन के बड़ा निकट रहा है सदा से। दो बातें हैं यहाँ पर अर्जुन के विषय में, दोनों ही

गीता में कृष्ण के अनेकों नाम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
गीता में कृष्ण के अनेकों नाम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
7 min

आचार्य प्रशांत: हम सबके भीतर, हम कितना भी छुपा लें, पर होता है कोई जो सत्य को छोड़ नहीं सकता। हम स्वयं को कितना भी भ्रम में रख लें, एक तल पर सच्चाई हम सबको पता होती है। वास्तव में अगर सच्चाई पता ना हो तो स्वयं को भ्रम में

कृष्ण ही अंतिम उपाय || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
कृष्ण ही अंतिम उपाय || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
8 min

आचार्य प्रशांत: इन सैकड़ों श्लोकों की यात्रा करेंगे हम। इस यात्रा में ये सोच कर आगे नहीं बढ़िएगा कि आप पहले से कुछ भी जानते हैं। हर जगह रुकिए और पूछिए — ये क्या हो रहा है? उसको आदत-सा बना लीजिए, अभ्यास करिए।

जो अभ्यास आपका बाहर की तरफ़ रहता

अपने ही विरुद्ध रण है गीता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
अपने ही विरुद्ध रण है गीता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
9 min

आचार्य प्रशांत: पहले ही अध्याय में, अच्छे से देखिए, दो हैं जो परेशान हैं। कौन? रणक्षेत्र में दो हैं जिनकी चिंता पहले ही अध्याय में हमारे सामने आ जाती है — दुर्योधन और अर्जुन।

इस बात को अच्छे से पकड़िए। चिन्ताग्रस्त होना बुरा नहीं है; दुर्योधन वाली चिंता रखना बुरा

कृष्ण को चुनना ही जीत है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
कृष्ण को चुनना ही जीत है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
19 min

सञ्जय उवाच।

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रतीत् ॥२॥

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४॥

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥

अस्माकं तु

The message of Krishna || Neem Candies
The message of Krishna || Neem Candies
1 min
Celebrating Janmashtami? ||Neem Candies
Celebrating Janmashtami? ||Neem Candies
1 min

The world’s oldest calendar comes from India. They never recorded when Krishna was born, never, and they never recorded when the character called Krishna died. This was out of a simple understanding and respect that He is not a character at all. Characters come and go, so dates can be

मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई || (2020)
मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई || (2020)
3 min

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || २, ६६ ||

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस आयुक्त मनुष्य के अंतःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शांति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को

हमारे सुख की सच्चाई || (2020)
हमारे सुख की सच्चाई || (2020)
7 min

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥२, १५॥

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक १५

प्रश्नकर्ता: श्रीभगवद्गीता में श्रेष्ठ बुद्धि वाले मनुष्य के

पाप माने क्या? क्या मात्र स्त्रियाँ ही पापी हैं? || (2020)
पाप माने क्या? क्या मात्र स्त्रियाँ ही पापी हैं? || (2020)
21 min

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || १, ४० ||

कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक ४०

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते

असली ब्राह्मण कौन? || (2020)
असली ब्राह्मण कौन? || (2020)
3 min

प्रश्नकर्ता: जाति से ब्राह्मण हूँ और पंडिताई करता हूँ। आपको सुनने के बाद लगा कि मैं लोगों को भ्रमित कर रहा हूँ। मेरा वास्तविक कर्म क्या है?

आचार्य प्रशांत: सच्चे पंडित बन जाइए और सच्चे ब्राह्मण बन जाइए। आपके समक्ष जो ग्रन्थ है आज, वो साफ़ बताता है कि पंडित

याद रखने योग्य एक बात || (2020)
याद रखने योग्य एक बात || (2020)
78 min

भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च | अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ||

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् | जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ||

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी—इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदों वाली

कृष्ण का नित्य स्मरण कैसे किया जाए? || (2020)
कृष्ण का नित्य स्मरण कैसे किया जाए? || (2020)
4 min

प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी, प्रणाम। गीता आदि ग्रंथों को दूर से ही पढ़ने का मन करता है, करीब से पढ़ने पर शांति की जगह अशांति मिलती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार का मूल कृष्ण ही हैं।

कबीर साहब भी कहते हैं -

कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढ़े बन माहि।

सपने से बाहर आओ, स्वयं का अवलोकन करो || (2020)
सपने से बाहर आओ, स्वयं का अवलोकन करो || (2020)
32 min

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगरूढ़ हो जाने पर उस योगरूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पो का अभाव है, वही कल्याण में हेतु

ज्ञानयोग और कर्मयोग || (2020)
ज्ञानयोग और कर्मयोग || (2020)
16 min

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।

ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्म योगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग फल स्वरुप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय

करने योग्य काम कौनसा? || (2020)
करने योग्य काम कौनसा? || (2020)
3 min

श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।

श्रीभगवान् बोले – जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य काम करता है, वह सन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला सन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग

श्रीकृष्ण के सिवा और कोई मित्र नहीं || (2020)
श्रीकृष्ण के सिवा और कोई मित्र नहीं || (2020)
10 min

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।

सुहृद् (दिल का अच्छा), मित्र और वैरी के प्रति उदासीन (अर्थात् निष्पक्ष, पक्षपातरहित), मध्यस्थ (द्वैत के दोनों सिरों में से कहीं भी स्थापित नहीं), द्वेष्य और बन्धुगणों में (शत्रुओं और मित्रों में), धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यंत श्रेष्ठ है।

बिना संकल्प आगे कैसे बढ़ें? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
बिना संकल्प आगे कैसे बढ़ें? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
8 min

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव | न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ||

हे अर्जुन! जिसको सन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग जान; क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक २

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, संकल्पो के बिना कोई जीवन

क्या मात्र आस्था काफी है? || (2020)
क्या मात्र आस्था काफी है? || (2020)
11 min

अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।

अर्जुन बोले – हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रध्दा रखने वाला है, किंतु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त

ममत्वबुद्धिरहित माने क्या? || (2020)
ममत्वबुद्धिरहित माने क्या? || (2020)
2 min

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये।।

कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुध्दि के लिए कर्म करते हैं।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक ११

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कृष्ण जी कह रहे हैं, "कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन,

संसार से विरक्त कैसे हों? || (2020)
संसार से विरक्त कैसे हों? || (2020)
9 min

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।

जो पुरुष अंतरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक २४

शांत मन को कैसे प्राप्त हों? || (2020)
शांत मन को कैसे प्राप्त हों? || (2020)
24 min

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।

जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत मन को प्राप्त

मन को समभाव में कैसे स्थित करें? || (2020)
मन को समभाव में कैसे स्थित करें? || (2020)
5 min

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।

जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा उस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही स्थित हैं।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय

एकाकी रहो, कृष्ण के साथ रहो
एकाकी रहो, कृष्ण के साथ रहो
9 min

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।

मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थिर होकर आत्मा को परमात्मा में लगाए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक १०

प्रश्नकर्ता: श्रीकृष्ण बोल रहे हैं कि “मन और इन्द्रियों सहित शरीर

कृष्ण की बात हम समझ क्यों नहीं पाते? || (2020)
कृष्ण की बात हम समझ क्यों नहीं पाते? || (2020)
5 min

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा | न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् || २, १२ ||

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ही ऐसा है कि इससे आगे हम

अर्जुन की निरपेक्षता || (2020)
अर्जुन की निरपेक्षता || (2020)
25 min

अथ व्यवटस्थतान्दृष्टवा धातकराष्ट्रान्कटपध्वजः | प्रवृत्तेशस्त्रसम्पातेधनुरुद्यम्य पाण्डवः | हृषीकेशंतदा वाक्यटमदमाह महीपते || १, २० ||

सेनयोरुभयोमकध्येरथंस्थाप्य मेऽच्श्यतु | यावदेताटन्निरक्षेऽहंयोद्धुकामानवटस्थतान् || १, २१||

हे राजन! इसके बाद कपिध्वज ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषिकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा

क्या कृष्ण भी पापी हुए? || (2020)
क्या कृष्ण भी पापी हुए? || (2020)
11 min

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: || १, ३६ ||

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक ३६

प्रश्नकर्ता: अर्जुन गीता के छत्तीसवें श्लोक में कह रहे हैं कि आततायियों को मारकर

आज के समय में भक्ति उचित है, या ज्ञान? || (2019)
आज के समय में भक्ति उचित है, या ज्ञान? || (2019)
9 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आज के समय के लिए भक्ति उचित है कि ज्ञान? भक्ति मार्ग या ज्ञान मार्ग?

जितना मुझे समझ में आया है, जो शायद ग़लत हो। भक्ति से आजकल समझ में आता है कि नाम लेना, मंदिर जाना या मंत्र आदि

मरते समय श्रीकृष्ण का स्मरण करने से मोक्ष मिल जाएगा? || (2019)
मरते समय श्रीकृष्ण का स्मरण करने से मोक्ष मिल जाएगा? || (2019)
6 min

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न गीता से सम्बंधित है। भगवान कृष्ण ने गीता में बोला हुआ है कि मरते वक़्त अगर मेरा स्मरण किया जाए तो वो मुझे ही प्राप्त होता है। और उसी गीता में उन्होंने बोला हुआ है कि मैं कण-कण में हर प्राणियों में वास करता

कर्म, अकर्म, विकर्म, सकाम कर्म, निष्काम कर्म || (2020)
कर्म, अकर्म, विकर्म, सकाम कर्म, निष्काम कर्म || (2020)
5 min

प्रश्नकर्ता: गीता में श्रीकृष्ण तीन तरीके के काम का ज़िक्र करते हैं: सकाम कर्म, कर्म, अकर्म और विकर्म। तो इनमें क्या भेद है?

आचार्य प्रशांत: कर्म, अकर्म, विकर्म, सकाम कर्म, निष्काम कर्म। चलो समझते हैं। संसार माने गति। प्रकृति माने परिवर्तन, समय माने परिवर्तन। ये पाँच तरह के कर्म क्या

कर्ताभाव से जुड़े भ्रम || (2021)
कर्ताभाव से जुड़े भ्रम || (2021)
7 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम स्वयं को कर्ता मानें या नहीं?

आचार्य प्रशांत: कर्ता तुम हो, लगातार हो, तुम्हीं हो, कोई और नहीं है। आम आदमी जिस स्थिति पर बैठा है उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि वो लगातार खुद को ही कर्ता माने। आम आदमी के लिए बोल रहा हूँ,

क्या पुनर्जन्म होता है? आत्मा, अस्तित्व, या व्यक्ति का? || (2019)
क्या पुनर्जन्म होता है? आत्मा, अस्तित्व, या व्यक्ति का? || (2019)
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प्रश्नकर्ता: ओशो कहते हैं कि तुम्हारा पुनर्जन्म नहीं होता लेकिन शारीरिक मृत्यु के बाद भी मन रहता है और उसी मन का पुनर्जन्म होता है। तो कृपया उस पर थोड़ा प्रकाश डालिए। और इसी तरह का सवाल है कि आप कहते हैं कि मृत्यु के बाद कुछ भी नहीं होता;