Maya

जो बहुत होशियार बनते हैं  || नीम लड्डू
जो बहुत होशियार बनते हैं || नीम लड्डू
1 min

बहुत मोटी मार पड़ती है ठीक तब जब तुम्हें ज़रा भी अंदेशा नहीं होता कि मार खाने वाले हो। माया भी कोई छोटी-मोटी खिलाड़न थोड़े ही है। बेहोशों को छोड़ देती है, वह कहती है, “यह तो पहले ही गिरा हुआ है इसको क्या गिराएँ? शू!” वह भी पसंद करती

The feminine smell and the snake || Neem Candies
The feminine smell and the snake || Neem Candies
1 min

Yesterday I was reading that the male snake chases the female snake following her scent, the trail of her odor. Snakes can’t generally see much. They can’t even hear much. So, the deodorant that you use is Prakriti and the purpose, too, is prakritik. The odor of the female

ऐसे गँवा रहे हो ज़िंदगी || नीम लड्डू
ऐसे गँवा रहे हो ज़िंदगी || नीम लड्डू
1 min

माया एक औसत ज़िंदगी का नाम है।

उफ्! कैसे पकड़ोगे?

द एवरेज लाइफ़!

माया, वो चेहरा है जिसमें कुछ खास नहीं। तुम उसे याद ही नहीं रख सकते, इतना साधारण चेहरा है माया। माया जीवन के उन दिनों, उन घण्टों, उन हफ़्तों, उन पलों का नाम है जिनमें कुछ खास

All change is towards reality; the reality itself cannot change || On Vivekachudamani (2018)
All change is towards reality; the reality itself cannot change || On Vivekachudamani (2018)
17 min

Questioner (Q): All experiences unfold in consciousness and are fundamentally subjective in the sense that there is no objective world out there independent of consciousness. This brings me to the concept of illusion. If the world and our experiences of it are illusions, then the world is devoid of meaning;

माया दो प्रकार की || (2018)
माया दो प्रकार की || (2018)
18 min

अहंशब्देन विख्यात एक एव स्थित: पर:। स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्त: कथं स्याद्देहक: पुमान्।।

“ ‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है, अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है। फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”

~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३१)

साधन-चतुष्टय क्या है? साधक के लिए ये क्यों अनिवार्य है? || (2018)
साधन-चतुष्टय क्या है? साधक के लिए ये क्यों अनिवार्य है? || (2018)
26 min

हरि है खांड रेत मांहि बिखरी, हाथी चुनी न जाई। कहैं कबीर गुरु भली बुझाई, चींटी होय के खाई।। ~ संत कबीर

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कबीर साहब का एक श्लोक भेजा है, कह रहे हैं कि इसका अर्थ बताएँ। और कहते हैं कि “इन्होंने भी नित्य और अनित्य

कठिन परिस्थितियों में ज्ञान काम क्यों नहीं आता? || (2018)
कठिन परिस्थितियों में ज्ञान काम क्यों नहीं आता? || (2018)
8 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बताया तो बहुत गया है कि विषम परिस्थितियों में भी व्यवहार कैसा करें पर जब वैसी विपरीत या विषम परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तब सारा ज्ञान हिरा जाता है (खो जाता है) और आदमी अपना आपा खो बैठता है।

आचार्य प्रशांत: वह तो होगा ही, ज्ञान से

झूठ नहीं है संसार || (2018)
झूठ नहीं है संसार || (2018)
19 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, कभी-कभार संसार निरर्थक लगता है लेकिन ज़्यादा समय संसार ही सच लगता है। दिल है कि मानता नहीं, क्या करें? आपके चरणो में आश्रय दो।

आचार्य प्रशांत: संसार सच लगता है तो कोई ग़लती नहीं हो गई। झूठ भी नहीं है संसार। बात सच-झूठ की नहीं

प्रकृति है मैया, अहम है बबुआ || (2021)
प्रकृति है मैया, अहम है बबुआ || (2021)
19 min

आचार्य प्रशांत: जीवात्मा प्रकर्ति से युक्त है। युक्त माने? जुड़ा हुआ, योग में। जो चीज़ किसी से योग में हो उसे कहते हैं युक्त। जीवात्मा त्रिगुणी प्रकृति से योग में है तो जीवात्मा गुणों से युक्त है। जीवात्मा प्रकृति से योग में है इसका क्या अर्थ है?

बात समझते चलिएगा।

प्रकृति ही माया है || (2020)
प्रकृति ही माया है || (2020)
22 min

आचार्य प्रशांत: विश्व है, पूरा ब्रह्मांड ही है — ऐसा किसको लगता है? विश्व है भी इसका प्रमाण, या गवाह, या अनुभोक्ता कौन है? अहं है और मात्र अहं है उसके अलावा कोई नहीं है। आप ही हैं जिसके लिए ये विश्व है। यह तो छोड़िए कि आप नहीं रहेंगे

सच को नहीं, झूठ को तलाशो
सच को नहीं, झूठ को तलाशो
11 min

आचार्य प्रशांत: राघव ने प्रश्न पूछा है, कहते हैं, “आचार्य जी प्रणाम, ज़िन्दगी में लगातार एक अभाव का विचार बना रहता है। जब किसी चीज़ में डूब जाता हूँ, या जब संतों को सुनता हूँ और पढ़ता हूँ, तो वो चला जाता है, लेकिन पुनः वापस आ जाता है। कोई

बाहर से नहीं, भीतर से धोखा देती है वो
बाहर से नहीं, भीतर से धोखा देती है वो
9 min

प्रश्नकर्ता: कहते हैं कि जैसे ही इंसान भक्ति की तरफ़ बढ़ता है, तो प्रकृति उसमें बहुत अड़चनें डालती है, माया बहुत अड़चनें डालती है। हमारे इधर बिरादरी में एक महात्मा जी रहे थे, महात्मा मंगतराम जी, उन्नीस-सौ-तिरपन में उनका देहांत हो गया था, तो उन्होंने भी बहुत - मतलब जैसे

Most spirituality is either self-delusion or self-deception
Most spirituality is either self-delusion or self-deception
5 min

Questioner: My question is not about concept, it's more about attitude. I see in the spiritual community, normally we spend a lot of time talking about thoughts, about god, about concepts, about the subjectivity of things and when we go back to our daily life, we just do as everybody

Brahm, God, Guru, Maya, and you — don't get lost
Brahm, God, Guru, Maya, and you — don't get lost
14 min

Questioner (Q): Isn't everything just Māyā? Then what is God? What is the relationship of God with Māyā?

Acharya Prashant (AP): You see, Māyā becomes all things, correct? Māyā becomes all things. So, you find it expressed in both ways. Sometimes, it is said—Māyā becomes all things

तीन गलतियाँ जो सब करते हैं
तीन गलतियाँ जो सब करते हैं
14 min

आचार्य प्रशांत: सत्य को मायापति कहा गया है; समझते हैं। माया क्या? वो जो हमें प्रतीत होता है, जिसकी हस्ती के बारे में हमें पूरा विश्वास हो जाता है, पर कुछ ही देर बाद या किसी और जगह पर, किसी और स्थिति में हम पाते हैं कि वो जो बड़ा

समूची प्रकृति की इच्छा
समूची प्रकृति की इच्छा
13 min

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असम्वेदनशील क्यों होती है?

आचार्य प्रशांत: प्रकृति ने ऐसा क्या किया भाई? तुम प्रकृति ही हो, तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से स्वयं प्रकृति निर्वाण खोज रही है। मैं बार-बार कहता हूँ न कि तुम अहंकार हो; अहंकार कोई

सामान लौटाओ, चैन से सोओ
सामान लौटाओ, चैन से सोओ
21 min

आचार्य प्रशांत: कोई ऐसा नहीं है जो समाप्त हो जाना चाहता हो। बड़ी अजीब बात है ये; कोई आयु हो, कोई वर्ण हो, कोई रंग हो, कोई लिंग हो, कोई देश हो, कोई काल हो - जैसे हम सब के भीतर बने रहने की एक निरंतर अभीप्सा रहती है। कोई

पुल पर घर नहीं बनाते
पुल पर घर नहीं बनाते
15 min

आचार्य प्रशांत: देखो प्रकृति से, संसार से भागा नहीं जा सकता, लेकिन प्रकृति और संसार तुम्हारे लिए आख़िरी चीज़ भी नहीं हो सकते। बहुत ध्यान से समझो इस बात को। ना इनसे भाग सकते हो—किससे?—दुनिया से, संसार से। अपने शरीर से बाहर निकलकर भाग सकते हो? तो संसार से बाहर

The origin of Maya
The origin of Maya
5 min

Acharya Prashant: Māyā and Brahm are beginningless for you. ‘For you’ because the question is coming ‘from you’. So, to you, these two are beginningless. Why are these two beginningless? Why can’t their origin be known? Because Māyā does not comprise of an entity called ‘Māyā*’. *

In the right battle, defeat is victory
In the right battle, defeat is victory
17 min

Questioner (Q): My question is about renunciation. I find within me the response about what I have to do, like renunciation and poverty. I see in myself inside but somehow I am fighting very strongly with the opposite in the opposite direction. And I never find the bravado to really

आओगे तो तुम भी राम के पास ही || आचार्य प्रशांत, रामायण पर (2018)
आओगे तो तुम भी राम के पास ही || आचार्य प्रशांत, रामायण पर (2018)
14 min

प्रसंग:

प्रभु का रूप अतुल्य है

मन्दोदरी ने रावण से कहा, “यदि तुम्हें सीता को पाने की इतनी ही इच्छा है, तो तुम उसके पास राम का रूप धारण करके क्यों नहीं चले जाते?” तुम तो मायावी हो, माया का इतना उपयोग तो कर ही सकते हो। रावण ने उत्तर

माया तो राम की ही दासी है || आचार्य प्रशांत, श्रीरामचरितमानस पर (2017)
माया तो राम की ही दासी है || आचार्य प्रशांत, श्रीरामचरितमानस पर (2017)
15 min

तव माय बस फिरऊॅं भुलाना ।

ताते मैं नहिं प्रभु पहिचाना ।।

~ संत तुलसीदास

आचार्य प्रशांत: "तव माय", तुम्हारी माया। "बस फिरऊॅं भुलाना", उसी के वश होकर भूला-भूला सा, भटका-भटका सा फिर रहा हूँ। "ताते", उस कारण। "मैं नहिं प्रभु पहिचाना", मैं प्रभु को पहचान नहीं पाया।

हास्य है

जब सत्य और माया दोनों आकर्षक लगें || आचार्य प्रशांत (2019)
जब सत्य और माया दोनों आकर्षक लगें || आचार्य प्रशांत (2019)
6 min

प्रश्नकर्ता: सत्य और माया, दोनों अच्छे लगते हैं। बहुत चंचलता होती है। कोई उपाय बताएँ।

आचार्य प्रशांत: एक माया बुरी लगती है, एक माया अच्छी लगती है—ये मत कहो कि सत्य भी अच्छा लगता है और माया भी अच्छी लगती है। सत्य के सामने बुरा लगना ठहर सकता है, बंद

न ऊर्जा न शक्ति, तुम सद्बुद्धि माँगो || आचार्य प्रशांत (2018)
न ऊर्जा न शक्ति, तुम सद्बुद्धि माँगो || आचार्य प्रशांत (2018)
11 min

प्रश्नकर्ता (प्र): आचार्य जी, शरीर और ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा से बने हैं, तो इस शरीर में हम वो परम ऊर्जा कैसे महसूस करें?

आचार्य प्रशांत (आचार्य): थोड़ी-सी ऊर्जा बढ़ जाती है तो थर्मामीटर लेकर दौड़ते हो। और ब्रह्मांड की परम ऊर्जा तुम्हारे शरीर में आ गई तो क्या करोगे?

सिद्धियों और शक्तियों का क्या महत्त्व || आचार्य प्रशांत (2019)
सिद्धियों और शक्तियों का क्या महत्त्व || आचार्य प्रशांत (2019)
3 min

प्रश्नकर्ता: अक्सर ऐसा सुनने में आता है कि किसी के पास कोई सिद्धि है और किसी के पास कोई शक्ति है। आध्यात्मिक जगत में ऐसे चर्चे बड़े सुनने को मिलते हैं। जीवन में मुमुक्षा जागृत हो या समाधि प्राप्त हो, इन सब में इन सिद्धियों का क्या महत्व होता है?

बाहरी घटनाएँ अन्दर तक हिला जाती हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)
बाहरी घटनाएँ अन्दर तक हिला जाती हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)
16 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समय बदल रहा है, और जिस क्षेत्र में मैं कार्यरत हूँ उस क्षेत्र में धीरे-धीरे मंदी आ रही है। मैं इस मंदी से आंतरिक रूप से बहुत ज़्यादा प्रभावित हुआ हूँ। कारणवश अब आर्थिक रूप से भी मैं बिल्कुल खाली हो गया हूँ, और इस प्रक्रिया में

Even the wise ones behave according to their Prakrati || Acharya Prashant, on Bhagavad Gita (2020)
Even the wise ones behave according to their Prakrati || Acharya Prashant, on Bhagavad Gita (2020)
12 min

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।। 3.33 ।।

sadṛiśhaṁ cheṣhṭate svasyāḥ prakṛiter jñānavān api

prakṛitiṁ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṁ kariṣhyati

Even a man of wisdom behaves according to his own nature. Being follows by their nature. What can restraint do?

~ Shrimad Bhagavad Gita, Chapter 3,

तुम्हारा दुश्मन तुम्हारे भीतर बैठ शासन कर रहा है || आचार्य प्रशांत (2019)
तुम्हारा दुश्मन तुम्हारे भीतर बैठ शासन कर रहा है || आचार्य प्रशांत (2019)
13 min

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। कल आपने अनुशासन के बारे में कहते हुए 'शासन' शब्द को अलग करके उसके विषय में भी बताया था। आपने कहा था कि, "व्यक्ति वास्तव में जान जाए कि कौन है, जो सच्चा है और उसमें शासित हो जाए।"

मैं जब अपना जीवन देखता हूँ तो

हमारे छह दुश्मन
हमारे छह दुश्मन
17 min

आचार्य प्रशांत: बहुत पुराना ग्रंथ है हमारा - श्रीमद्भगवद्गीता, इतना तो हम सब जानते ही हैं। उसमें इंसान के छह शत्रुओं की, छह दुश्मनों की बात करी है श्री कृष्ण ने। ठीक है?

उनको नाम दिया है - षड-रिपु(छह दुश्मन)

और क्या हैं वो?

काम, क्रोध, मद, मोह, मात्सर्य

अपनी हैसियत जितनी ही चुनौती मिलती है सबको || आचार्य प्रशांत (2019)
अपनी हैसियत जितनी ही चुनौती मिलती है सबको || आचार्य प्रशांत (2019)
12 min

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। कई सालों से साधना कर रहा हूँ, कुछ समय से आपको सुन रहा हूँ, जीवन में स्पष्टता बहुत हद तक आई है। अब जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा हूँ, मेरी बीमारियों का पता चल रहा है। जैसे साधना में आगे बढ़ रहा हूँ, माया का हमला

रिवॉल्वर बचाकर रखो, असली दुश्मन दूसरा है || आचार्य प्रशांत (2019)
रिवॉल्वर बचाकर रखो, असली दुश्मन दूसरा है || आचार्य प्रशांत (2019)
12 min

प्रश्न: आचार्य जी, जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी भ्रमित रहता हूँ कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित।

आचार्य प्रशांत: एक फ़िल्म देखी थी मैंने। उसमें समझ ही में न आए कि नायक इतना पिट क्यों रहा है। पिक्चर का क्लाइमेक्स है, चरम पर पहुँच चुकी है। दुश्मनों

कामवासना: अध्यात्म बनाम मनोविज्ञान || आचार्य प्रशांत (2020)
कामवासना: अध्यात्म बनाम मनोविज्ञान || आचार्य प्रशांत (2020)
10 min

प्रश्न: योग वाशिष्ठ में स्त्री भोग एवं संगत को 'सर्पिणी' की संज्ञा दी गई है। परंतु फ्राइड ने कहा है कि लैंगिक इच्छाओं के दमन से मानसिक विकृतियाँ पैदा होती हैं। अध्यात्म और मनोविज्ञान में ये विरोधाभास कैसा?

आचार्य प्रशांत: अध्यात्म तुमको बता रहा है कि - "जिसको तुम रस्सी

स्त्री कौन? मालकियत क्या?।। आचार्य प्रशांत ओशो और श्रृंगार शतकम् पर (2017)
स्त्री कौन? मालकियत क्या?।। आचार्य प्रशांत ओशो और श्रृंगार शतकम् पर (2017)
5 min

स्त्रियाँ प्रेम में उन्मत्त होकर जिस काम को करने लग जाती हैं, ब्रह्म भी उन्हें उस काम से नहीं हटा सकता।

*~  श्रृंगार शतकम, श्लोक संख्या 54* 

जब कोई स्त्री अपने को तुम्हारे चरणों में रख देती है, तब अचानक तुम्हारे सिर पर ताज की तरह बैठ जाती है।

~

Want to know what attachment is? || Acharya Prashant (2019)
Want to know what attachment is? || Acharya Prashant (2019)
8 min

Question: Acharya Ji Pranaam! Once we are attached to anything, there is so much of suffering.

Please help me understand this.

Acharya Prashant Ji: End of suffering is just an idea for us. Let’s rather talk about suffering – that is a fact, that is our daily experience. The questioner

Why do we enjoy being with 'nature' (Prakriti)? || Acharya Prashant (2019)
Why do we enjoy being with 'nature' (Prakriti)? || Acharya Prashant (2019)
7 min

Question: When I sit in open Sky, I see the vastness, and the vastness feels like Freedom to me. It gives me lot of calmness and peace. The cool breeze, the rains, the Sun, these elements of physical nature give a lot of peace.

These elements of nature, especially the

It is only with the eyes of Truth that you see the false as false || (2016)
It is only with the eyes of Truth that you see the false as false || (2016)
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Questioner (Q): Lots of layers of Ego are dropping and I wake up in the middle of the night and realize that I cannot trust anyone, anything including myself. My mind is going crazy and underneath it, I think I know all the answers to my questions. It feels so

When one knows only the external, then one lives only for the sake of the external || Acharya Prashant (2015)
When one knows only the external, then one lives only for the sake of the external || Acharya Prashant (2015)
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Questioner: Our education system is at fault because it has been designed to make you a worker, not to live life the way it should be.

Speaker: Yes, yes. It is designed to make you into ‘something’. At some places, it is designed to not to make you

महत्वपूर्ण है वो टलता रहा, व्यर्थ से जीवन भरता रहा || आचार्य प्रशांत, संत रूमी पर (2015)
महत्वपूर्ण है वो टलता रहा, व्यर्थ से जीवन भरता रहा || आचार्य प्रशांत, संत रूमी पर (2015)
14 min

They ask, “When someone passes eighty then they play. Will they play before eighty?” I say.

~ Rumi

वक्ता: रूमी कह रहे हैं कि यह सवाल तो बड़ा आम है कि “उम्र बढ़ जाएगी, ज़िन्दगी बीत जाएगी उसके बाद क्या?” पंक्तियाँ हैं कि “अस्सी के बाद क्या ज़िन्दगी में मौज,

From Him comes all illusion, and from Him comes redemption || Acharya Prashant (2015)
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4 min

सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा

नितनेम (रहरासि साहिब)

All living beings are Yours.You are the Giver of all souls.

Nitnem (Rahraasi Saahib)

Speaker: “Sabhi jeea tumaare jee tuun jeea ka daataara (All living beings are Yours. You are the Giver of all souls).”

The question is:

वो सबको बुलाता है || आचार्य प्रशांत (2014)
वो सबको बुलाता है || आचार्य प्रशांत (2014)
8 min

वक्ता: स्रोत में मिल जाना ही स्रोत को जानना है| स्रोत को जानने के लिये स्रोत में विलीन हो जाओ|

श्रोता १: सर, इस पीड़ा को, दूरी को कम करने में भी तो श्रद्धा की ही ज़रुरत है न? यह दूरी ही पीड़ा है, ‘मेरे होने’ और ‘बस होने’ के

In spiritual practice, why do we often just succumb? || Acharya Prashant ( 2011)
In spiritual practice, why do we often just succumb? || Acharya Prashant ( 2011)
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Question: Sir, daily life puts forth so many insane demands and expectations that it becomes difficult to understand what to follow and what not to follow.

Answer: We all have felt that occasional boredom while reading our texts. We all have often felt that inertia to stay back at home

माया छोड़नी नहीं, सत्य पाना है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
माया छोड़नी नहीं, सत्य पाना है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
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माया छोड़न सब कहै, माया छोरि न जाय|

छोरन की जो बात करु, बहुत तमाचा खाय|

वक्ता: छोड़ने की बात वैसे ही है, जैसे आधी रात कहे, ‘मुझे अपनी कालिमा छोड़ देनी है’| पाए बिना छोड़ने का ख्याल वैसा ही है कि जैसे रात कहे कि सूरज ना आए, क्योंकि

बस बेहोश बहाव || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
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वक्ता: तुम नाव के पास जाते हो तो पाते हो कि नाव का जो नाविक है, वो सो रहा है। तो नाव आब पूरी तरह से लहरों के हवाले है। जो भी बड़ी लहर आएगी उस पर बाहर से प्रभाव डालेगी और अपने साथ ले जाएगी, फिर दूसरी लहर आएगी

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